ईश्वर की देन – सुंदरता और समझदारी

एक बार कोणार्कगढ़ राज्य के राजा के घर एक बहुत सुंदर कन्या का जन्म हुआ। जिसका नाम राजा ने रति रखा। वह कन्या इतनी सुंदर थी कि आस – पास के राज्य मे ऐसी सुंदर कोई कन्या नहीं थी। उसकी सुंदरता को देख राजा को बस एक ही डर रहता था कि उसका विवाह होने से पहले कुछ अनहोनी न हो जाये। अपनी कन्या को लोगो की बुरी नज़र से बचाने के लिए उसने अपनी कन्या को कभी महल से बाहर नही जाने दिया। इसके अलावा राजा ने अपनी कन्या को लोगो से लड़ पाने के लिए उसे शस्त्र – विद्या भी सिखाई। इतनी सुंदर होने के कारण उस कन्या में एक कमी भी थी उसे स्वयं पर एवं अपने पिता के राजा होने पर बहुत घमंड था। इसीलिए वह किसी भी दासी से अच्छे से बात नही करती थी। वहीं दूसरी तरफ उसी राज्य में एक ब्राह्मण के यहां भी एक कन्या का जन्म हुआ। जिसका नाम राधा रखा गया। वह कन्या दिखने में बिल्कुल सुंदर नहीं थी पर उसे बाल्यावस्था से ही एक गुण मिला था कि वह पूरे राज्य मे ही नहीं बल्कि आस – पास के सभी राज्यों में सबसे विद्वान मनुष्यों की श्रेणी में आती थीं। उसे पाँच वर्ष की आयु से ही बहुत सी जड़ी – बूटी एवं धार्मिक ग्रंथो का ज्ञान था। उसे बहुत – से शास्त्र तो कंठस्त थी। साथ ही साथ वह भगवान की पूजा भी करती थी। दोनों ही कन्यायें एक दूसरे से बिल्कुल भिन्न थी, परंतु फिर भी बार – बार प्रकृति उन्हें एक दूसरे के आस- पास ले आती थी। परंतु राजकुमारी अपने घमंड के कारण उस कन्या को देख कर भी अनदेखा कर देती थी। परंतु उन दोनों में एक समानता भी थी वे दोनों ही दिल की बहुत अच्छी थी। एक बार प्रकृति ने ऐसा खेल रचा के वो दोनों एक दूसरे को अनदेखा कर ही नहीं पाई। वास्तव में हुआ यूं के एक बार ब्राह्मण की कन्या जिसका नाम राधा था मंदिर में भगवान के दर्शन के लिए गयी पर आते वक्त वह पास के बगीचे में टहलने के लिए रुक गयी। बगीचे में बहुत सुंदर फूल, पेड़ – पौधे और एक छोटा सा तालाब भी था। मंदिर से कुछ ही दूर एक नदीं बहती थी। बगीचा मंदिर के भीतर ही था। उसी दिन राजकुमारी भी बगीचे में टहलने आ गयी।

राजकुमारी रति बहुत घमंडी थी क्योंकि उसे यह लगता था कि सौंदर्य सभी गुणों में सर्वोपरि होता हैं। दिल अच्छा होते हुए भी उसका घमंड उसके अच्छे कर्मों के आड़े आ जाता था।

राजकुमारी का नाम ” राजकुमारी रति ” था। जब उसने उस कन्या को बगीचे में टहलते देखा तो उसने अपनी एक दासी को भेजकर कहलवा दिया कि वो यहां से चली जाए क्योंकि अब राजकुमारी यहां टहलने आयी हैं। परंतु राधा ने विन्रमता पूर्वक राजकुमारी से मिलने का प्रस्ताव रखा।

राधा एक नेकदिल व समझदार लड़की थी। उसे ईश्वर पर भरोसा था। इसीलिए वह सभी से प्रेम से बात करती थी। और अपनी समझदारी के बल पर सबका मन मोह लेती थी।

राजकुमारी ने मना कर दिया। इस पर राधा ने दासी को समझाते हुए कहा -” कि राजकुमारी से कहो कि मुझे कुछ पूछना है इसीलिए मैं उनसे मिलना चाहती हूँ”। परंतु राजकुमारी नहीं मानी । तभी आस- पास कुछ शोर सुनाई दिया । इस पर राजकुमारी रति और राधा दोनो उस और दौड़े तभी उन्हें पता चला कि एक बालक नदीं में गिर गया हैं। राधा ने थोड़ा सोचा औऱ मंदिर से एक रस्सी ले आयी। उधर राजकुमारी पानी मे कूदने की तैयारी कर रही थी। तभी राधा ने कहा – “कि ये रस्सी अपनी कमर में बांध लो”। राजकुमारी ने पहले तो मना कर दिया पर जब गौर से देखा कि वह रस्सी एक पेड़ से बंधी हैं तो वह समझ गयी कि राधा ने क्या सोचा हैं। और उसने रस्सी अपनी कमर के बांध ली और नदीं के अंदर छलांग लगा दी। उसने बच्चे को कस के पकड़ लिया और आस – पास खड़े लोगो ने और राधा ने मिलकर उन्हें ऊपर खींच लिया। सबने उनकी बहादुरी की सराहना की। उन्होंने सभी को धन्यवाद कहा और अपने रास्ते चल दिये। तभी राधा ने राजकुमारी को रोक कर बात करने की कोशिश की परंतु राजकुमारी ने फिर मना कर दिया। तब राजकुमारी रति से राधा ने सिर्फ यहीं कहा कि – “तुम्हें अपनी सुंदरता पर घमंड हैं परंतु यदि तुम मुझे हरा दो तो मैं तुम्हे सुंदर मानु।” यह सुनकर राजकुमारी रति क्रोधित हो गयी और उन्होंने राधा को नीचा दिखाने के लिए हां कर दी। तब राधा ने कहा – ” कल फिर उसी बगीचे में मिलेंगे। जहां हमारी प्रतिस्पर्धा होगी। बाकी बाते कल करेंगे”।….

आखिर राधा ने राजकुमारी रति के घमंड को चूर- चूर कर दिया। कैसे?? आओ देखते हैं।

अगले दिन जब राधा और राजकुमारी रति मिले । तब राधा ने उनके सामने एक प्रतिस्पर्धा करने का प्रस्ताव रखा। राजकुमारी भी प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार हो गयी। इस पर राधा ने राजकुमारी को प्रतिस्पर्धा के कुछ नियमों से अवगत कराया। उसने बताया – “कि प्रतिस्पर्धा का एक स्तर तुम निर्धारित करोगी एवं दूसरा मैं। परंतु आखरी स्तर तुम्हारी एवम मेरी सखियां मिलकर निर्धारित करेंगीं। ताकि किसी प्रकार का कोई पक्षपात न हो”। इस पर राजकुमारी मान गयी। और प्रतिस्पर्धा आरंभ हुई। पहले राधा ने राजकुमारी रति को स्तर चुनने को कहा। तो राजकुमारी ने तलवारबाजी को चुना। क्योंकि वह शस्त्र विद्या में निपुण थी। और राजकुमारी ने अपनी दासियो से कहकर दो तलवारो का प्रबंध किया। और कुछ ही देर में प्रतिस्पर्धा के पहले स्तर का आरंभ हुआ। दोनो में तलवारबाजी शुरू हुई। राधा को शास्त्र का तो ज्ञान था परंतु शस्त्र का नही। फिर भी वह अपनी पूरी ताकत से कोशिश कर रही थी। परंतु राजकुमारी रति जो इस विद्या में निपुण थी बहुत आसानी से तलवार चला रही थी। जब दोनों की तलवारे टकरा रही थी तो दोनों की सखियाँ एवम राजकुमारी की दासियाँ भी उनका हौसला बढ़ा रही थी। राजकुमारी तलवार बहुत तेज़ी से चला रही थी इसीलिये राधा को बहुत तकलीफ हो रही थी। अब वह थक चुकी थी। परंतु फिर भी अपनी जगह पर डटी हुई थी। इस बार राजकुमारी ने अपनी तलवार उठायी तो राधा ने झुककर स्वयं को बचा लिया। उधर से एक बार राजकुमारी का वार हुआ। और एक बार फिर राधा ने स्वयं को बचा लिया।पर इस बार राधा थोड़ी घायल हो गयी। तभी राजकुमारी ने दुबारा वार किया। अचानक हुए वार को राधा संभाल नही पायी औऱ उसकी तलवार हाथ से छूटकर गिर गयी। और राजकुमारी ने तभी अपनी तलवार उसकी गर्दन पर तान दी। उधर किसी ने राजा को यह समाचार दे दिया था। इसलिए राजा भी वहां आ चुके थे। यही नहीं उन्होंने यह सब देख भी लिया था।

जब वो अपनी बेटी को रोकने के लिए आगे बढ़ रहे थे तभी किसी ने उन्हें रोक दिया आखिर वो कौन था?? जिसने उन्हें रोक दिया।

जब राजा ने पीछे मुड़कर देखा तो वहाँ कोई और नहीं बल्कि महारानी श्यामली थी। राजा ने जब महारानी से इसका कारण पूछा तो उन्होंने बताया कि – “हमारी राजकुमारी को अपने राजकुमारी होने और सब कुछ मिल जाने के कारण स्वयं पर घमंड हो गया है। और इसको यदि अभी समाप्त नहीं किया गया तो वह कभी किसी मनुष्य का सम्मान नही करेगी। इसी कारण उसे ये प्रतिस्पर्धा करने दीजिये ताकि इससे राजकुमारी को सीख मिले और वह सभी मनुष्यों का सम्मान करे”।

राजा अब समझ चुके थे कि – अपनी पुत्री को सब कुछ देकर भी वह क्या नहीं दे पाए। वह जान गये थे कि – वह अपनी पुत्री को दुसरो का सम्मान करना नहीं सिखा पाए। अब वे महारानी की बात समझ गए थे और इसीलिए वे वहीं शातिं से खड़े होकर वह प्रतिस्पर्धा देखने लगे ।

पहले स्तर में राधा ने अपनी हार स्वीकार करते हुए, दूसरे स्तर का प्रस्ताव रखा। और राजकुमारी ने अपनी जीत के घमंड में चूर होकर हाँ कर दी।

राधा ने पहले स्तर में हार कर भी हार नहीं मानी । अब वह अपनी चुनौती के साथ तैयार थी। राधा अपने ज्ञान से राजकुमारी का घमंड चूर – चूर करना चाहती थी।

इस बार राधा को स्तर चुनना था। तो उसने समझदारी से काम लेते हुए ज्ञान को चुना अर्थात उसने शास्त्र विद्या को चुना। और फिर राधा ने राजकुमारी से शास्त्रों से संबंधिफत प्रश्न पूछे। इन प्रश्नों को सुनते ही राजकुमारी का दिमाग घूम गया। वह उन प्रश्नों के जवाब देने में असक्षम थी, इसलिए वह उस चरण में सफल नहीं हो पाई। अर्थात दूसरे चरण में हार राजकुमारी की हुई। अब बारी तीसरे चरण की थी। जिसका चुनाव राजकुमारी रति एवं राधा की सखियों को करना था। किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था। तभी कुछ सोचने के पश्चात राधा की एक सहेली ने दौङ की प्रतिस्पर्धा का सुझाव दिया। सबने बहुत सोच – विचार किया। अंत में सभी ने फैसला किया – कि प्रतिस्पर्धा का तीसरा चरण यही सही रहेगा। राजकुमारी रति की सखियाँ जानती थी कि राजकुमारी रोज सवेरे व्यायाम करती हैं एवं दौड़ लगाती है। इसलिए उन्होंने सोचा कि राजकुमारी इस चरण में जरूर जीतेंगी। यही सोचकर उन्होंने स्वीकार कर लिया और प्रतिस्पर्धा के नियम से दोनों प्रतियोगियों को अवगत कराया। इस प्रतिस्पर्धा में दोनों को एक वृक्ष को छूकर वापस आना था। जो वृक्ष को छूकर पहले लौटता है वही विजेता होगा ।आखिर प्रतिस्पर्धा आरंभ हुई। राधा एवं रति दोनों ही अपनी पूरी जान लगाकर दौड़ रही थी। दोनों अब उस वृक्ष तक पहुँचने ही वाले थे कि – तभी दौड़ते – दौड़ते अचानक राजकुमारी रति का पैर मुड़ गया और वह गिर पड़ी। राधा चाहती तो राजकुमारी को वही छोड़कर, उस प्रतिस्पर्धा में विजयी हो सकती थी। परन्तु उसने एेसा नहीं किया। बल्कि राधा ने तो राजकुमारी रति की सहायता की। राधा ने राजकुमारी को सहारा दिया और कहा कि अब इस प्रतिस्पर्धा में विजयी हम दोनों होंगे। राधा राजकुमारी को उसी वृक्ष के पास ले गयी और कहा -” लो अब जीत हम दोनों की हुई, अब आप यहाँ विश्राम करें”। राजकुमारी राधा की इस उदारता एवं स्नेह को देख गद्य- गद्य हो उठी और राधा को अपने गले से लगा लिया। अब वह दोनों सखी बन गयी थी।

वही दूसरी तरफ राजा और रानी यह सब देख रहे थे। महाराज रानी के किये निर्णय पर प्रसन्न थे। क्योंकि अब उनकी पुत्री सभी मनुष्यों का सम्मान करना सीख गयी थी। अब उन्हे कोई भय नही था क्योंकि राजकुमारी की सखी राधा जो बन गयी थी। राजा और रानी ने राधा की सरहाना की और उसे धन्यवाद भी कहा। राधा ने मुस्कुराते हुए उनका अभिवादन किया।

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